- “द टाटा ग्रुप बियॉन्ड बिज़नेस” पेश करती है उद्योग और सामाजिक प्रतिबद्धता की प्रेरक कहानी
जेबी लाइव, रिपोर्टर
जमशेदपुर : जमशेदपुर, जिसे भारत का पहला सुव्यवस्थित औद्योगिक नगर कहा जाता है, केवल इस्पात उत्पादन का केंद्र नहीं बल्कि राष्ट्र-निर्माण की जीवंत प्रयोगशाला भी रहा है। इसी ऐतिहासिक और औद्योगिक विरासत को समर्पित पुस्तक “द टाटा ग्रुप बियॉन्ड बिज़नेस: इम्पैक्ट, एनकोमियम्स एंड अकोलेड्स” प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्था पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया द्वारा प्रकाशित की गई है। यह कॉफी टेबल बुक टाटा समूह की 150 से अधिक वर्षों की प्रेरक यात्रा को दस्तावेज़ीय रूप में प्रस्तुत करती है और विशेष रूप से जमशेदपुर एवं टाटा स्टील की गौरवशाली भूमिका को रेखांकित करती है। पुस्तक केवल औद्योगिक उपलब्धियों का संकलन नहीं है, बल्कि उस मूल्य-आधारित नेतृत्व और सामाजिक प्रतिबद्धता का प्रमाण है जिसने टाटा ग्रुप को विश्व के सबसे सम्मानित औद्योगिक समूहों में स्थापित किया।
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पुस्तक में टाटा समूह से जुड़ी उन विशिष्ट विभूतियों का विस्तृत परिचय शामिल है, जिन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्वोच्च सम्मान अर्जित किए। इसमें तीन भारत रत्न, सत्रह पद्म विभूषण, बासठ पद्म भूषण, इक्यासी पद्म श्री, पाँच मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार, नौ द्रोणाचार्य पुरस्कार, उन्यासी अर्जुन पुरस्कार, पाँच राष्ट्रीय खेल पुरस्कार और तेरह माउंट एवरेस्ट विजेताओं का विवरण संकलित है। ये आँकड़े इस तथ्य को उजागर करते हैं कि जमशेदपुर की धरती केवल इस्पात ही नहीं, बल्कि असाधारण प्रतिभाओं को भी संजोती रही है। पुस्तक विशेष रूप से रतन टाटा और उनके दूरदर्शी नेतृत्व को श्रद्धांजलि है, जिन्होंने औद्योगिक उत्कृष्टता के साथ श्रमिक कल्याण, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल और सामुदायिक विकास के क्षेत्र में भी मानक स्थापित किए।
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पुस्तक के लेखक संदीप मुरारका ने तथ्यात्मक और संदर्भात्मक शैली में टाटा समूह की विरासत को संकलित किया है। यह कृति उद्योग, प्रबंधन, इतिहास और सामाजिक अध्ययन में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए उपयोगी है। पुस्तक यह संदेश देती है कि जब उद्योग मानवीय मूल्यों और राष्ट्र-निर्माण की भावना से जुड़ता है, तब वह केवल आर्थिक समृद्धि ही नहीं, बल्कि पीढ़ियों तक प्रेरणा देने वाली विरासत का निर्माण करता है। “द टाटा ग्रुप बियॉन्ड बिज़नेस” पाठकों को यह अनुभव कराती है कि टाटा समूह की सफलता केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अनुकरणीय रही है।






















