- पुरानी संस्कृति और परंपरा को छोड़ना और भूलना नहीं चाहिए : सुनील कुमार दे
- पौष संक्रांति और गंगा स्नान की धार्मिक मान्यता
जेबी लाइव, रिपोर्टर
जमशेदपुर : पौष संक्रांति के दिन गंगा स्नान का विशेष धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि इसी दिन भक्त भगीरथ ने कठोर तपस्या कर मां गंगा को मृत्युलोक में अवतरित किया था, जिससे कपिल मुनि के आश्रम में अभिशप्त सागर वंश को मुक्ति मिली। इसी कारण मां गंगा को भागीरथी भी कहा जाता है। गंगा के स्पर्श मात्र से सागर वंश का उद्धार हुआ, इसलिए पौष संक्रांति के अवसर पर गंगा स्नान को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। सभी लोग गंगा तट तक नहीं जा पाते, ऐसे में गांवों में लोग पास के नदी, तालाब या जलाशय में स्नान कर नए वस्त्र धारण करते हैं और मकर कीर्तन करते हुए अपने घर लौटते हैं। यही परंपरा आज भी पोटका प्रखंड के नुआग्राम गांव में पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ निभाई जा रही है।
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तालाब से गांव परिक्रमा तक गूंजा मकर कीर्तन
14 जनवरी 2026 को सुबह करीब 10 बजे नुआग्राम गांव की कीर्तन मंडली ने साहित्यकार और शिल्पी सुनील कुमार दे के नेतृत्व में गांव के तालाब से मकर कीर्तन की शुरुआत की। कीर्तन करते हुए मंडली ने पूरे गांव की परिक्रमा की। इस दौरान सुनील कुमार दे ने मकर कीर्तन की परंपरा का महत्व बताते हुए चैतन्य महाप्रभु से जुड़ा श्लोक प्रस्तुत किया—
“पौष संक्रांति दिने शोचिर नंदन,
गंगा स्नाने चोलीलेन लोए भक्तगण।”
उन्होंने बताया कि मान्यता के अनुसार पौष संक्रांति के दिन चैतन्य महाप्रभु अपने भक्तों के साथ हरिनाम करते हुए गंगा स्नान के लिए पहुंचे थे। इसी भावना से मकर कीर्तन की परंपरा चली आ रही है। इसके साथ यह भी मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने राधारानी के साथ मकर पताया था।
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संस्कृति और पहचान को जीवित रखने का संकल्प
मकर कीर्तन का समापन शिव मंदिर की परिक्रमा के बाद लक्ष्मी मंदिर में किया गया। कीर्तन के उपरांत मकर चावल और तिल के लड्डू प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं के बीच वितरित किए गए। कीर्तन मंडली में सुनील कुमार दे के साथ शंकर चंद्र गोप, भास्कर चंद्र दे, स्वपन दे, तरुण दे, तपन दे, प्रशांत दे, शैलेंद्र प्रामाणिक, अर्जुन मुदी, गौरांग दे, भवतारण कार्जी सहित कई लोगों ने सक्रिय सहयोग दिया। इस अवसर पर सुनील कुमार दे ने कहा कि झारखंड के कई गांवों में आज भी ऐसी परंपराएं जीवित हैं और इन्हें संरक्षित रखना बेहद जरूरी है, क्योंकि किसी भी समाज की पहचान उसकी भाषा, संस्कृति और परंपरा से होती है। वहीं शंकर चंद्र गोप ने कहा कि नुआग्राम में मकर संक्रांति के दिन कीर्तन करने की परंपरा बहुत प्राचीन है, जिसे वे बचपन से देखते आ रहे हैं और आने वाली पीढ़ियों को भी इसे आगे बढ़ाना चाहिए।
























