इलेक्ट्रॉनिक लाइटों और रंग-बिरंगी झालरों के बीच पारंपरिक दीयों का क्रेज बरकरार
पूजा-पाठ के लिए मिट्टी के कलश, हाथी और खिलौने भी खरीद रहे लोग
स्वदेशी परंपरा को मिल रहा बढ़ावा, मिट्टी के दीयों की खरीदारी से मजबूत होगी कुम्हारों की आजीविका
जेबी लाइव, रिपोर्टर
जमशेदपुर : दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही जमशेदपुर के बाजारों में रौनक बढ़ने लगी है। घरों की साफ-सफाई, रंगाई-पुताई और सजावट के साथ लोगों ने दीपावली की खरीदारी भी शुरू कर दी है। शहर के विभिन्न बाजारों में सुबह से शाम तक खरीदारों की चहल-पहल देखने को मिल रही है। खासकर मिट्टी के दीये, कलश, हाथी, खिलौने, धूपदानी और पूजा-पाठ में इस्तेमाल होने वाली पारंपरिक मिट्टी की सामग्रियों की दुकानों पर लोगों की भीड़ जुटने लगी है। इन दुकानों पर सबसे अधिक महिलाएं खरीदारी करती नजर आ रही हैं। बाजारों में एक ओर इलेक्ट्रॉनिक लाइटें, रंग-बिरंगी झालरें और आधुनिक सजावटी सामान लोगों को आकर्षित कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मिट्टी के पारंपरिक दीयों की मांग भी बनी हुई है। लोग घरों की बाहरी सजावट के लिए आधुनिक रोशनी का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन पूजा और शुभ अवसरों पर मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा को आज भी प्राथमिकता दे रहे हैं। यही वजह है कि दीपावली से पहले ही कुम्हारों की दुकानों पर ग्राहकों की आवाजाही बढ़ गई है।
इलेक्ट्रॉनिक झालरों के बीच मिट्टी के दीयों की चमक बरकरार, पारंपरिक सामान खरीद रहे लोग

खरीदारी करने पहुंची महिलाओं का कहना है कि दीपावली केवल घरों को रोशनी से सजाने का त्योहार नहीं है, बल्कि यह हमारी सनातन संस्कृति, परंपरा और धार्मिक आस्था का प्रतीक भी है। इस पर्व पर भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना की जाती है। पूजा में मिट्टी के दीये, कलश और अन्य पारंपरिक सामग्रियों का विशेष महत्व होता है। महिलाओं के अनुसार, आधुनिकता के इस दौर में भले ही घरों को सजाने के लिए कई तरह के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण उपलब्ध हो गए हैं, लेकिन मिट्टी के दीये का धार्मिक और भावनात्मक महत्व अपनी जगह कायम है। इलेक्ट्रॉनिक लाइटों से घर आकर्षक दिखाई दे सकता है, लेकिन मिट्टी के दीये जलाने से दीपावली की पारंपरिक अनुभूति और पूजा का माहौल अलग ही होता है। उनका कहना है कि हर साल दीपावली पर मिट्टी के दीये खरीदना और उन्हें घर तथा पूजा स्थल पर जलाना परिवार की पुरानी परंपरा का हिस्सा है। यही कारण है कि इस बार भी वे मिट्टी के दीये और अन्य पूजा सामग्री खरीदने के लिए बाजार पहुंच रही हैं।
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महिलाओं की पहली पसंद बने मिट्टी के दीये, गणेश-लक्ष्मी पूजा के लिए पारंपरिक सामानों की खरीदारी
सनातन धर्म में दीपावली का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम 14 वर्ष का वनवास पूरा करने और रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद माता सीता एवं लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे थे। उनके आगमन की खुशी में अयोध्यावासियों ने पूरे नगर को दीपों से रोशन कर उनका स्वागत किया था। इसी परंपरा की स्मृति में प्रत्येक वर्ष कार्तिक अमावस्या को दीपावली का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन घरों, मंदिरों और प्रतिष्ठानों में दीप जलाकर सुख, समृद्धि और खुशहाली की कामना की जाती है। लोगों का मानना है कि मिट्टी के दीये केवल प्रकाश का साधन नहीं हैं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत और सदियों पुरानी परंपरा के प्रतीक भी हैं। चाइनीज लाइटें और इलेक्ट्रॉनिक झालरें घरों को आकर्षक बना सकती हैं, लेकिन पूजा-पाठ में मिट्टी के दीयों का महत्व अलग है। यही वजह है कि आधुनिक सजावट के साधनों की उपलब्धता के बावजूद लोग दीपावली पर पारंपरिक मिट्टी के दीयों को विशेष स्थान देते हैं।
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भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन की याद में मनाई जाती है दीपावली, मिट्टी के दीयों से जुड़ी है परंपरा
दीपावली का त्योहार मिट्टी के दीये और अन्य पारंपरिक सामान बनाने वाले कुम्हार परिवारों के लिए भी खास महत्व रखता है। कुम्हारों का कहना है कि मिट्टी के दीये तैयार करने में काफी मेहनत और समय लगता है। इसके लिए सबसे पहले मिट्टी जुटाई जाती है। इसके बाद उसे साफ कर आकार दिया जाता है और धूप में सुखाने के बाद भट्ठी में पकाया जाता है। तैयार होने के बाद दीयों को बाजार तक पहुंचाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में परिवार के सभी सदस्य सहयोग करते हैं। कुम्हारों के मुताबिक, आधुनिक दौर में इलेक्ट्रॉनिक लाइटों और सजावटी सामानों का चलन बढ़ने से पारंपरिक मिट्टी के सामानों के कारोबार पर असर पड़ा है। हालांकि दीपावली ऐसा अवसर है, जब मिट्टी के दीयों की मांग फिर बढ़ जाती है। इस वर्ष भी बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही शुरू होने से कुम्हार परिवारों को अच्छी बिक्री की उम्मीद जगी है। उनका कहना है कि दीपावली के दौरान होने वाली बिक्री से उन्हें बेहतर आमदनी का अवसर मिलता है। उन्होंने लोगों से स्थानीय कारीगरों द्वारा तैयार मिट्टी के दीये और अन्य सामान खरीदने की अपील की, ताकि उनकी आजीविका को सहारा मिल सके।
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दीपावली से कुम्हार परिवारों को बड़ी उम्मीद, मिट्टी के दीयों की बिक्री से बढ़ेगी आमदनी
जमशेदपुर के बाजारों में मिट्टी के दीयों की बढ़ती मांग को स्वदेशी परंपरा और स्थानीय हस्तकला को बढ़ावा देने के रूप में भी देखा जा रहा है। मिट्टी के दीये खरीदने से न केवल कुम्हार परिवारों को रोजगार मिलता है, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक कला और संस्कृति भी सुरक्षित रहती है। स्थानीय कारीगरों द्वारा तैयार किए गए दीये और पूजा सामग्री खरीदना उनके श्रम को सम्मान देने के साथ उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत करने में भी मददगार है। कुल मिलाकर, दीपावली की तैयारियों के बीच बाजारों में मिट्टी के दीयों की बढ़ती मांग यह साबित करती है कि आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के बावजूद लोगों का अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़ाव कायम है। इलेक्ट्रॉनिक रोशनी और रंग-बिरंगी झालरों के बीच मिट्टी के छोटे-छोटे दीये अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं। इस दीपावली मिट्टी के दीयों की लौ जहां घरों और मंदिरों को रोशन करेगी, वहीं स्थानीय कुम्हार परिवारों के जीवन में भी खुशियों और आर्थिक उम्मीदों का उजाला लेकर आएगी।

























