14 अक्टूबर को मनाया जाएगा 32वां शहादत दिवस, गोईलकेरा हाट मैदान में श्रद्धांजलि कार्यक्रम
सारंडा-कोल्हान में आज भी जीवित हैं उनके संघर्ष और विचार
बीड़ी मजदूरों को संगठित कर तेज किया अधिकारों का संघर्ष
गुवा गोलीकांड और आदिवासी आंदोलन की विरासत में देवेंद्र माझी का योगदान
शहीद देवेंद्र माझी के विचार आज भी जल, जंगल और जमीन की लड़ाई को देते हैं प्रेरणा
जेबी लाइव, रिपोर्टर
मनोहरपुर : जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों तथा मूलवासियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले शहीद देवेंद्र माझी का जीवन संघर्ष, साहस और सामाजिक न्याय के प्रति समर्पण की मिसाल है। उन्होंने अपना पूरा जीवन वंचित समुदायों के अधिकारों, आदिवासी अस्मिता और प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय लोगों के हक के लिए समर्पित कर दिया। 14 अक्टूबर को उनकी 32वीं पुण्यतिथि पर पश्चिमी सिंहभूम जिले के गोईलकेरा हाट मैदान में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इस अवसर पर उनके समर्थक और क्षेत्र के लोग उन्हें याद करते हुए उनके अधूरे सपनों को पूरा करने का संकल्प लेंगे। 15 सितंबर 1947 को एक गरीब आदिवासी किसान परिवार में जन्मे देवेंद्र माझी का बचपन कठिन परिस्थितियों में बीता। तीन भाइयों और छह बहनों में सबसे छोटे देवेंद्र के पिता जगत माझी का निधन तब हो गया था, जब वह महज पांच वर्ष के थे। उनके भाई कालीदास माझी स्वतंत्रता सेनानी थे, जिनकी भी दुर्घटना में मृत्यु हो गई। उनकी मां कुनी माझी ने विपरीत परिस्थितियों में परिवार का पालन-पोषण किया। संघर्षपूर्ण बचपन ने देवेंद्र माझी के भीतर अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का साहस पैदा किया।
इसे भी पढ़ें : Chandil : चांडिल में बढ़ती आपराधिक घटनाओं पर उठे सवाल, थाना प्रभारी को निलंबित करने की मांग
शहीद देवेंद्र माझी की 32वीं पुण्यतिथि पर गोईलकेरा में होगा श्रद्धांजलि कार्यक्रम
देवेंद्र माझी का झुकाव विद्यार्थी जीवन से ही सामाजिक न्याय और समानता की ओर था। बताया जाता है कि आठवीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान एक शिक्षक द्वारा आदिवासियों के प्रति अपमानजनक टिप्पणी किए जाने पर उन्होंने इसका विरोध किया था। उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने सामाजिक बदलाव और आदिवासी अधिकारों के लिए अपना जीवन समर्पित करने का निर्णय लिया। वह गांव-गांव पैदल घूमकर लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने लगे। कोल्हान-पोड़ाहाट के दूरदराज के इलाकों में उन्होंने ग्रामीणों को संगठित किया और शिक्षा, सड़क, पेयजल तथा अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी समस्याओं को प्रमुखता से उठाया। उनका मानना था कि आदिवासी समाज का विकास तभी संभव है, जब लोगों को अपने अधिकारों की जानकारी हो और वे अन्याय के विरुद्ध संगठित होकर आवाज उठाएं। इसी सोच के साथ उन्होंने जनजागरण और सामाजिक आंदोलन को अपने संघर्ष का आधार बनाया।
इसे भी पढ़ें : Gua : छोटे वाहन चालकों की मांगों पर सेल प्रबंधन की चुप्पी से बढ़ा असंतोष
गांव-गांव जाकर देवेंद्र माझी ने आदिवासियों को अधिकारों के प्रति किया जागरूक
वर्ष 1969 में देवेंद्र माझी ने बीड़ी श्रमिकों को संगठित कर कंपनियों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। मजदूरों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने के कारण वर्ष 1971 में उन्हें गिरफ्तार कर हजारीबाग जेल भेज दिया गया। जेल में उनकी मुलाकात झारखंड आंदोलन के प्रमुख नेता शिबू सोरेन से हुई। बताया जाता है कि दोनों ने अलग-अलग क्षेत्रों में झारखंड को अलग राज्य बनाने की लड़ाई जारी रखने का संकल्प लिया। जेल से रिहा होने के बाद देवेंद्र माझी ने जंगलों में रहने वाले आदिवासियों और मूलवासियों की जमीन पर अधिकार के सवाल को और मजबूती से उठाया। उनका संघर्ष वन भूमि पर खेती करने वाले लोगों के अधिकारों, विस्थापन की समस्या और प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय समुदायों की भागीदारी से जुड़ा था। उन्होंने ग्रामीणों को संगठित कर यह संदेश दिया कि जल, जंगल और जमीन केवल प्राकृतिक संपदा नहीं, बल्कि आदिवासी जीवन, संस्कृति और आजीविका का आधार हैं।
इसे भी पढ़ें : Manoharpur/Anandpur : आनंदपुर में सवारी से भरा टेम्पो पलटा, युवक गंभीर रूप से घायल
गुवा गोलीकांड के बाद भी पीछे नहीं हटे देवेंद्र माझी
आदिवासी अधिकारों और प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय समुदायों के हक की लड़ाई के दौरान कोल्हान क्षेत्र में आंदोलन तेज हुआ। 8 सितंबर 1980 को गुवा गोलीकांड ने क्षेत्र के आदिवासी आंदोलन को गहराई से प्रभावित किया। इस घटना में पुलिस की गोलीबारी से कई लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद भी आदिवासी अधिकारों, जमीन और विस्थापन से जुड़े सवाल क्षेत्र की राजनीति और सामाजिक आंदोलनों के केंद्र में बने रहे। देवेंद्र माझी का संघर्ष केवल भूमि अधिकारों तक सीमित नहीं था। वह आदिवासी समाज की पहचान, संस्कृति, स्वाभिमान और सामाजिक समानता के भी पक्षधर थे। उनके विचारों में जंगलों का संरक्षण और स्थानीय समुदायों के जीवन तथा आजीविका की रक्षा एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। सारंडा और पोड़ाहाट के ग्रामीण इलाकों में लोगों को संगठित करने तथा उनकी समस्याओं को सामने लाने के प्रयासों ने उन्हें जननेता के रूप में पहचान दिलाई।
इसे भी पढ़ें : Adityapur : आदित्यपुर में कृषि विज्ञान केंद्र के पास मिला चालक का शव, परिजनों ने जताई हत्या की आशंका
14 अक्टूबर 1994 को हत्या, आज भी जीवित हैं उनके विचार
14 अक्टूबर 1994 को गोईलकेरा हाट बाजार में देवेंद्र माझी की हत्या कर दी गई। उनकी हत्या से क्षेत्र में शोक की लहर फैल गई। हालांकि, उनके संघर्ष और विचारों की विरासत आदिवासी समाज तथा समर्थकों के बीच बनी रही। आज भी जल, जंगल और जमीन पर अधिकार, स्थानीय समुदायों की भागीदारी, विस्थापन और आदिवासी स्वाभिमान जैसे मुद्दे उनके आंदोलन की याद दिलाते हैं। उनकी पुण्यतिथि पर आयोजित होने वाला श्रद्धांजलि कार्यक्रम केवल एक जननेता को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि उनके संघर्ष के उद्देश्यों पर विचार करने का भी मौका है। 14 अक्टूबर को गोईलकेरा हाट मैदान में लोग उन्हें श्रद्धांजलि देकर उनके आदर्शों को आगे बढ़ाने का संकल्प लेंगे। सारंडा और कोल्हान के जंगलों में देवेंद्र माझी के संघर्ष की स्मृतियां आज भी जीवित हैं। उनका जीवन संदेश देता है कि सामाजिक न्याय, अधिकारों की रक्षा और वंचित समुदायों की आवाज बुलंद करने के लिए संगठन, जनजागरण और निरंतर संघर्ष आवश्यक हैं।























