पूर्व स्वास्थ्य मंत्री ने मातृभाषा में शिक्षा, शिक्षकों की नियुक्ति और विश्वविद्यालय व्यवस्था में सुधार की मांग उठाई
भाषाई शिक्षकों की कमी पर जताई नाराजगी
कोल्हान विश्वविद्यालय और शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल
मातृभाषा में शिक्षा और स्थानीय नियुक्ति को लेकर सरकार पर बढ़ा दबाव
जेबी लाइव, रिपोर्टर
बहरागोड़ा : झारखंड के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री एवं सिंहभूम उत्कल सभा के महासचिव डॉ. दिनेश कुमार षडंगी ने राज्य में भाषाई अल्पसंख्यकों की उपेक्षा और शिक्षा व्यवस्था की गिरती स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। बुधवार को अपने आवासीय कार्यालय परिसर में जारी प्रेस वक्तव्य में उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति (NEP) के तहत मातृभाषा में शिक्षा को अनिवार्य किया गया है, लेकिन राज्य में ओड़िया, बंगला और TRL भाषा के शिक्षकों के रिक्त पद अब तक नहीं भरे गए हैं। उन्होंने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक भाषाई शिक्षकों की भारी कमी विद्यार्थियों के भविष्य को प्रभावित कर रही है। डॉ. षडंगी ने मांग की कि राज्य के सभी महाविद्यालयों में प्रत्येक सत्र में कम से कम 10 भाषाई अल्पसंख्यक शिक्षकों की नियुक्ति सुनिश्चित की जाए। साथ ही बहरागोड़ा महाविद्यालय समेत अन्य शिक्षण संस्थानों में बंद पड़ी विज्ञान शिक्षा को पुनः शुरू करने के लिए तत्काल नए पद सृजित किए जाएं।
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झारखंड में शिक्षा व्यवस्था को लेकर बढ़ी चिंता, भाषाई अधिकारों की उठी मांग
डॉ. षडंगी ने क्लस्टर व्यवस्था के कारण विद्यार्थियों को विषय चयन में हो रही परेशानियों पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आउटसोर्सिंग व्यवस्था के बजाय तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी में स्थानीय युवाओं की स्थायी नियुक्ति होनी चाहिए। इसके अलावा वित्त-रहित शिक्षा नीति को समाप्त करने की मांग करते हुए उन्होंने कहा कि इससे शिक्षा व्यवस्था कमजोर हो रही है। उन्होंने संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल शास्त्रीय भाषा ओड़िया को केवल TRL समूह में रखने पर कोल्हान विश्वविद्यालय की कड़ी आलोचना की। डॉ. षडंगी ने मुख्यमंत्री से शिक्षा विभाग के लापरवाह अधिकारियों पर कार्रवाई करने और ‘झारखंड राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम 2026’ को जल्द लागू करने की मांग की। उनका कहना था कि इससे विश्वविद्यालय प्रशासन में पारदर्शिता आएगी और राज्य में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का मार्ग प्रशस्त होगा।























