हाईकोर्ट ने सरकार को बिंदुवार स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया, जून के अंतिम सप्ताह में होगी अगली सुनवाई
ग्रामसभा के अधिकार कमजोर करने का लगाया आरोप
पेसा कानून को लेकर राज्य सरकार और सामाजिक संगठनों के बीच बढ़ा विवाद
जेबी लाइव, रिपोर्टर
जमशेदपुर : झारखंड सरकार द्वारा अधिसूचित पेसा नियमावली को सही ढंग से लागू नहीं किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर झारखंड हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश एस.एम. सोनक एवं न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। यह याचिका रायमूल बांद्रा और अरविंद कुमार की ओर से दायर की गई है, जिसमें पेसा नियमावली के प्रावधानों और उसके क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। अदालत ने सरकार से पूछा है कि याचिकाकर्ताओं द्वारा लगाए गए आरोप तथ्यात्मक रूप से सही हैं या नहीं और क्या नियमावली संविधान की मूल भावना के अनुरूप लागू की गई है।
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झारखंड में पेसा कानून के क्रियान्वयन को लेकर बढ़ी कानूनी बहस
याचिका में कहा गया है कि राज्य सरकार ने पेसा नियमावली में मूल भावना के विपरीत संशोधन और प्रावधान लागू किए हैं, जिसके कारण आदिवासी एवं मूलवासी समुदायों को संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों से वंचित होना पड़ रहा है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि पेसा कानून के तहत ग्रामसभा को जो अधिकार प्राप्त हैं, उन्हें व्यवहारिक रूप से कमजोर कर दिया गया है। साथ ही यह भी कहा गया कि सरकार ने नियमावली को अपने नियंत्रण में रखने की मंशा से लागू किया है, जिससे स्थानीय समुदायों की स्वायत्तता प्रभावित हो रही है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत में यह भी दलील दी कि नियमावली को केवल “आई वॉश” बनाकर छोड़ दिया गया है और इसका वास्तविक लाभ ग्रामीण व आदिवासी समुदायों तक नहीं पहुंच पा रहा है।
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आदिवासी अधिकारों और ग्रामसभा की शक्तियों को लेकर उठे सवाल
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए प्रत्येक बिंदु पर स्पष्ट और तथ्यात्मक जवाब दाखिल करे। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि क्या नियमावली में किए गए प्रावधान संविधान और पेसा कानून की मूल अवधारणा के अनुरूप हैं। हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई जून माह के अंतिम सप्ताह में निर्धारित की है। इस मामले को लेकर आदिवासी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की नजरें अब अदालत की अगली सुनवाई पर टिकी हुई हैं।























