- पर्यावरण चेतना केंद्र बड़ा सिकदी के पहल पर ग्रामीणों ने सीखा प्राकृतिक उपचार का महत्व
- पारंपरिक ज्ञान और वन संपदा संरक्षण का लिया संकल्प
जेबी लाइव, रिपोर्टर
जादूगोड़ा : जादूगोड़ा प्रखंड के ग्वालकाटा पंचायत अंतर्गत सुदूर जंगल क्षेत्र बूटगोंडा में पर्यावरण चेतना केंद्र बड़ा सिकदी, पोटका की ओर से जंगल मेला का आयोजन किया गया। इस मेले का मुख्य उद्देश्य ग्रामीणों को जंगल में उपलब्ध जड़ी-बूटियों के महत्व और उनके औषधीय उपयोग की जानकारी देना था। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में ग्रामीण, महिलाएं और पारंपरिक वैद्य (कविराज) शामिल हुए। ग्राम प्रधान सह कविराज उदय नाथ मुर्मू ने कहा कि जंगल बचेगा तो दवा बचेगी। उन्होंने पेड़-पौधों की पहचान कराते हुए बताया कि जंगल में पाई जाने वाली कई जड़ी-बूटियां छोटे-मोटे रोगों के उपचार में कारगर हैं। ग्रामीणों को विभिन्न पत्तियों, जड़ों और वनस्पतियों की पहचान कर उनके उपयोग की जानकारी दी गई, ताकि वे सामान्य बीमारियों का इलाज स्थानीय संसाधनों से कर सकें।
इसे भी पढ़ें : Ranchi : नगड़ी में झारखंड राज्य किसान सभा का 8वां सम्मेलन संपन्न, नई राज्य काउंसिल का गठन
जड़ी-बूटियों की पहचान से आत्मनिर्भर बन रहे ग्रामीण

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पर्यावरण चेतना केंद्र के निदेशक सिदेश्वर सरदार ने कहा, “जंगल है तो जड़ी-बूटी है।” उन्होंने कहा कि जंगलों के कारण ही पारंपरिक कविराजों की पहचान और सेवा जीवित है, जिनके उपचार से अनेक ग्रामीण निरोग होते हैं। उन्होंने जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा को ग्रामसभा की मजबूती से जोड़ा और कहा कि जंगल में रहने वाले लोगों की आजीविका भी इन्हीं संसाधनों पर निर्भर है। इसी उद्देश्य से जंगल मेला आयोजित किया गया है ताकि लोग जंगल संरक्षण के प्रति जागरूक हों। इस अवसर पर क्षेत्र के छह कविराजों को सम्मानित भी किया गया।
इसे भी पढ़ें : Gua : सारंडा जंगल में IED विस्फोट, कोबरा अधिकारी अजय मलिक घायल
जंगल संरक्षण से ही मजबूत होगी ग्रामसभा और आजीविका
मेले के दौरान महिलाओं के बीच दोना-पत्ता निर्माण प्रतियोगिता, खेलकूद और अन्य पारंपरिक गतिविधियों का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विभीषण सरदार, गोपाल किस्कू, लखींद्र सरदार, सुरेश सरदार, अर्जुन सरदार, आनंदो सरदार, घासी राम सरदार (कविराज व ग्राम प्रधान), खेला राम मुर्मू, अनिल मुंडा, घना मार्डी सहित कई ग्रामीण उपस्थित रहे। महिलाओं की ओर से जोबा टुडू, कुमारी अनीता, प्रियंका मुंडा, लक्ष्मी सिंह, बिमला हांसदा, जस्मी टुडू, लखी सोरेन, सीता टुडू, चूड़ा सोरेन, मालती मुंडा और सफाली मुंडा समेत बड़ी संख्या में लोगों ने सक्रिय भागीदारी निभाई। ग्रामीणों ने संकल्प लिया कि वे जंगल को सहेजकर रखेंगे और पारंपरिक ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाएंगे।























